भारतीय वायुसेना के पहले महिला लॉजिस्टिक्स बैच की रिटायर्ड विंग कमांडर हैं अनुमा आचार्य का कहना है कि मैं नरेंद्र मोदी से प्रभावित थी, गुजरात में रहते हुए मैंने अच्छी सड़कें, छोटे उद्योग देखे थे, उनकी तारीफ़ भी सुनी थी. राजनीति में जाने का सोचने के बाद मैंने भाजपा से संपर्क भी किया और पार्टी के लिए काम भी किया. लेकिन बीते कुछ सालों में हुईं कई घटनाओं ने प्रधानमंत्री मोदी के बारे में मेरी राय बदलकर रख दी।
अनुमा आचार्य ने अपने विस्तृत लेख में लिखा है कि चूंकि मैंने अपने माता-पिता को अपनी उम्र के इक्कीसवें साल में खो दिया था, इसलिए अपने गृहनगर विदिशा के विकास और आधुनिकीकरण के लिए कुछ कर दिखाने का और इस तरह माता-पिता को श्रद्धांजलि देने का मन बना लिया। इरादा था कि पेंशन मिलते ही वायुसेना की नौकरी छोड़ कर विदिशा के लिए समर्पण से काम करूंगी।
जहां एक तरफ मैं श्रीमती इंदिरा गांधी से बचपन से प्रभावित थी, वहीं दूसरी तरफ मैं नरेंद्र मोदी से प्रभावित थी क्योंकि वर्ष 2009 में गुजरात प्रवास के दौरान अच्छी सड़कें और छोटे उद्योग देखे थे और लोगों से तारीफ भी सुनी थी।
2014 में उनकी शानदार जीत से बड़ी उम्मीदें भी जगी थीं। मैंने खोज-परख कर कांग्रेस पार्टी के एक सचिव और प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ) के जनसंपर्क अधिकारी (पीआरओ) को ईमेल लिखा. मुझे प्रधानमंत्री के तत्कालीन पीआरओ से तुरंत जवाब मिला। उन्होंने पहले मुझसे एक विस्तृत मुलाकात की और फिर आगे चलकर प्रधानमंत्री से भी मिलवाया। देश के प्रधानमंत्री से उनके दफ्तर में मिलने की खुशी ने मुझे सातवें आसमान पर पहुंचा दिया था और मुझे लगा था कि आगे चलकर मैं विदिशा के लिए जरूर कुछ कर सकूंगी।
प्रधानमंत्री ने मुझे गुजरात चुनाव के दौरान ग्राउंड वर्क करने और सीखने की सलाह दी। उन्होंने कहा कि उनके दफ्तर से मुझे समय पर संपर्क किया जाएगा, जो हुआ और मैं सब संशयों को हटाकर प्रधानमंत्री की कायल हो गई।
गुजरात के भाजपा मुख्यालय ‘कमलम’ में सब कुछ बहुत व्यवस्थित था और अनुशासित भी, लेकिन तीसरे ही दिन मैंने महिला नेताओं और कार्यकर्ताओं के बारे में नोटिस किया कि उन्हें रणनीतिक रूप से नहीं, सिर्फ सजावटी रूप में स्थान मिलता है।
गुजरात चुनाव में भाजपा को वांछित जीत नहीं मिली. मैं भी दिल में अनिर्णय लिए दिल्ली लौट आई। अपने कामों की विस्तृत रिपोर्ट बनाकर अमित शाह को दे दी। उन्होंने मेरे किए गए कामों की प्रशंसा की और कहा वे मुझे कुछ समय बाद सूचित करेंगे, जो कभी नहीं हुआ।
इस बीच बहुत-सी घटनाएं होती रहीं और मुझे लगने लगा कि प्रधानमंत्री कुछ खास प्रभावी नहीं दिख रहे थे। पर मेरे मोहभंग की शुरुआत कठुआ की घटना पर प्रधानमंत्री की लंबी चुप्पी से हुई। मैंने ट्विटर पर उन्हें टैग करते हुए इस नृशंस घटना पर कार्रवाई के लिए गुजारिशें भी कीं, लेकिन प्रधानमंत्री ने दो माह बाद जब कुछ बोला, तो उसकी कीमत ही नहीं रही थी।
उस घटना से भाजपा का चेहरा अलग दिखाने लगा था। फिर मेरा ध्यान प्रधानमंत्री की भाषा और भावों पर भी जाने लगा। जब वे दिवंगत पूर्व प्रधानमंत्रियों को अनवरत अपशब्द कहते थे तो लगता था कि वे इतने शक्तिशाली होने पर भी इतने परेशान क्यों हैं कि मृत लोगों पर भी हिकारत बरसा रहे हैं।
अवसर कोई भी हो, मुद्दा कहीं का भी हो, वे हमेशा सत्तर सालों की नाकामयाबी पर ही बात करते थे। ये सिलसिला फिर जारी ही रहा। मॉब लिंचिंग और उनका सही ठहराया जाना, सरकार के गलत कामों का प्रोपोगैंडा द्वारा प्रभावी बताने का प्रचार, आधे सच से शुरू पूरे झूठ पर खत्म होने वाली वॉट्सऐप की लाखों पोस्ट्स का प्रचार, कट्टरता को हिंदू धर्म बताने का प्रचार, जिसके कारण गुंडा तत्व भी निडर होने लगे।
पुलवामा आतंकी हमला, बालाकोट एयरस्ट्राइक, विंग कमांडर अभिनंदन से जुडी घटनाएं, सेना का राजनीति में भरपूर इस्तेमाल, विद्वान, लेखकों और पूर्व सेना अधिकारियों द्वारा प्रधानमंत्री को लिखी चिट्ठी पर प्रोपोगैंडा से चिट्ठी लिखने वालों की ही सार्वजनिक निंदा, प्रधानमंत्री की चुनावी भाषा का ओछा होते चले जाना और फिर प्रज्ञा ठाकुर को भोपाल से सांसद प्रत्याशी बनाना…
इस सबसे मुझे समझ में आ गया था कि प्रधानमंत्री में देश के प्रति समर्पण जैसा कुछ भी अनोखा नहीं हैं, वे भी अन्य राजनीतिक नेताओं की तरह या शायद उनसे भी ज्यादा आडंबरपूर्ण और अहंकारी हैं. उनकी हर कथनी और करनी में अंतर बढ़ता ही गया।
मैंने यह भी महसूस किया कि प्रधानमंत्री आत्मकेंद्रित हैं। उन्हें अपनी टीम के कार्यकर्ताओं को पैसों से शक्तिमान बनाना तो आता है लेकिन टीम के मंत्रियों को शक्तिसंपन्न नहीं करते हैं। यही कारण है कि कैबिनेट के तीन-चार मंत्रियों के अलावा न कोई जनता से सरोकार रखता है और न ही संवेदनशील है।
कोरोना महामारी के समय उनकी असंवेदनशीलता और भी मुखर हो कर सामने आई। इसी दौरान प्रधानमंत्री के वरदहस्त तले मीडिया का अनथक हिंदू मुस्लिम एजेंडा चलता रहा। कई निर्दोष बिना पुख्ता सबूतों के गिरफ्तार किए गए और उनका या तो भविष्य खत्म हो गया या अंधकार के हवाले कर दिया गया।
कोरोना योद्धाओं के सम्मान के नाम पर अजब-गजब काम किए गए और जो पैसा मजदूरों के काम आ सकता था, उसे आडंबरों पर खर्च करवा दिया। कोरोना काल ने इन सभी बातों ने इकठ्ठा हो कर मेरी आस्था पर आखिरी चोट का काम किया।
इसी का नतीजा था- मेरा वह ट्वीट, जो अचानक वायरल हो गया और अच्छे उद्देश्य को लेकर शुरू हुई मेरी अब तक की ‘मोदी-मोह से मोहभंग’ की कहानी भी सबके सामने आ गई।